- शैलजा वोहरा
हे नारी क्या तू अबला है , या तू काली
देख ज़रा इस धरती को , जो भरती इन्सान का पेट
पर इन्सान फिर भी करता अत्याचार
सहती रहती तू सब चुप चाप
फिर बनकर ज्वाला करते सब तहस नेहुस
तू कर खतम इन्सान के अंहकार को
ले आ वापस अपनी haryali को
तुझ में है वोह हिम्मत
हे नारी क्या तू अबला, या काली ?

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